जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन और प्रश्नपत्र लीक: भारत की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

Paper Leaks, Student Agitation at Jantar Mantar

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नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों का आंदोलन केवल प्रश्नपत्र लीक होने के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों युवाओं की उस पीड़ा, निराशा और आक्रोश का प्रतीक है, जिनके सपने बार-बार एक भ्रष्ट और असफल व्यवस्था की भेंट चढ़ जाते हैं।

केंद्र तथा राज्य सरकारों की विभिन्न भर्ती एजेंसियों द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का लगातार लीक होना आज देश की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन चुका है। प्रत्येक प्रश्नपत्र लीक केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि उन लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के विश्वास के साथ विश्वासघात है, जिन्होंने वर्षों की मेहनत, समय और धन इस आशा में लगाया कि उन्हें योग्यता के आधार पर अवसर मिलेगा।

इस समस्या का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं है। यह विद्यार्थियों और उनके परिवारों को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से भी तोड़ देता है।

देश के दूर-दराज़ गांवों से आने वाले छात्रों की स्थिति और भी अधिक दयनीय है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उन्हें दिल्ली, कोटा, हैदराबाद और अन्य महानगरों में आना पड़ता है। वे अत्यंत छोटे, भीड़भाड़ वाले कमरों में अमानवीय परिस्थितियों में रहने को विवश होते हैं। दिल्ली के मुखर्जी नगर, राजेन्द्र नगर तथा अन्य कोचिंग क्षेत्रों में रहने वाले हजारों छात्रों का जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं है।

देश अभी भी उन दर्दनाक घटनाओं को नहीं भूला है जब पिछले वर्ष बाढ़ के कारण कई छात्रों की जान चली गई थी। समय-समय पर कोचिंग संस्थानों में आग लगने जैसी घटनाओं ने भी सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। इससे भी अधिक दुखद यह है कि अनेक छात्र प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षाएँ निरस्त होने या बार-बार स्थगित होने के कारण गहरे अवसाद में चले जाते हैं। कुछ छात्र आत्महत्या जैसा भयावह कदम उठाने तक को विवश हो जाते हैं।

हर बार परीक्षा रद्द होने का अर्थ है—फिर से तैयारी, फिर से कोचिंग फीस, फिर से किराया, फिर से भोजन और जीवन-यापन का खर्च। यह बोझ उन माता-पिताओं के लिए असहनीय हो जाता है, जो अपनी सीमित आय में अपने बच्चों के भविष्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं।

जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन की प्रमुख मांग तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी। व्यापक जनाक्रोश और छात्रों के दबाव के बीच उन्होंने अपना पद छोड़ दिया। किंतु सबसे बड़ा प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या केवल एक मंत्री के इस्तीफे से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि भविष्य में कोई प्रश्नपत्र लीक नहीं होगा?

उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), एन्क्रिप्शन, ब्लॉकचेन तथा आधुनिक डिजिटल सुरक्षा तकनीकों का युग है। भारत के पास ऐसी तकनीकी क्षमता उपलब्ध है जिससे लगभग पूर्णतः सुरक्षित परीक्षा प्रणाली विकसित की जा सकती है। आवश्यकता केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और संस्थागत जवाबदेही की है।

दुर्भाग्य से सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही प्रायः तात्कालिक राजनीतिक लाभ-हानि में उलझे रहते हैं, जबकि समस्या कहीं अधिक गहरी है।

ऐसा प्रतीत होता है कि पिछले कई दशकों में विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के दौरान एक संगठित 'शिक्षा माफिया' विकसित हो गया है, जिसने शिक्षा को सेवा नहीं बल्कि व्यापार बना दिया है।

आज स्थिति यह है कि प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों में छोटे-छोटे बच्चों के प्रवेश के लिए अभिभावकों से प्रतिवर्ष दो लाख से पाँच लाख रुपये तक की फीस ली जाती है। इसके अतिरिक्त अनेक स्थानों पर भारी-भरकम कैपिटेशन फीस अथवा अन्य प्रकार के अनौपचारिक भुगतान की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा धीरे-धीरे सामान्य नागरिक की पहुंच से बाहर होती जा रही है।

उच्च शिक्षा की स्थिति भी इससे बहुत भिन्न नहीं है। देशभर में बड़ी संख्या में निजी विश्वविद्यालय स्थापित हुए हैं। इनमें से अनेक उत्कृष्ट कार्य भी कर रहे हैं, किंतु यह भी सत्य है कि कुछ संस्थानों ने शिक्षा को लाभ कमाने का माध्यम बना दिया है। कहीं-कहीं ऐसा प्रतीत होता है मानो डिग्रियाँ भी एक महंगे व्यावसायिक उत्पाद में बदल गई हों।

एक समय था जब प्री-मेडिकल, प्री-इंजीनियरिंग अथवा विद्यालयी शिक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर योग्यता सूची तैयार होती थी और उसी के आधार पर व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश मिलता था। आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। हजारों छात्र ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में केवल 'डमी एडमिशन' लेकर अपना अधिकांश समय महंगे कोचिंग संस्थानों में बिताते हैं।

कोचिंग उद्योग आज हजारों करोड़ रुपये का व्यवसाय बन चुका है। इसका सबसे अधिक आर्थिक बोझ देश के मध्यम वर्ग पर पड़ता है, जो भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। विद्यालयों का महत्व कम होता जा रहा है और शिक्षा का केंद्र धीरे-धीरे कोचिंग संस्थानों की ओर स्थानांतरित हो गया है।

जंतर-मंतर का आंदोलन केवल प्रश्नपत्र लीक के विरोध तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। इसे भारत की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर पुनर्विचार का अवसर समझा जाना चाहिए। विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि प्रश्नपत्र लीक केवल एक लक्षण है; वास्तविक बीमारी उससे कहीं अधिक गहरी है।

आज आवश्यकता सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की है। भर्ती परीक्षाओं को अत्याधुनिक तकनीक से सुरक्षित बनाया जाए, पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो तथा गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा को सुलभ और सशक्त बनाया जाए। साथ ही निजी शिक्षण संस्थानों के प्रभावी नियमन तथा योग्यता-आधारित प्रवेश प्रणाली को पुनः स्थापित करना समय की मांग है।

शिक्षा को व्यापार नहीं, राष्ट्र निर्माण का सर्वोच्च साधन माना जाना चाहिए। हमें अपनी उस पुरानी परंपरा की ओर लौटना होगा, जहाँ शिक्षा को एक पवित्र दायित्व समझा जाता था, न कि लाभ कमाने का माध्यम।

यदि हम केवल मंत्रियों के इस्तीफों तक सीमित रहेंगे और शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं का समाधान नहीं करेंगे, तो करोड़ों युवाओं का भविष्य बार-बार इसी प्रकार अनिश्चितता, निराशा और अन्याय का शिकार होता रहेगा

लेखक: एडवोकेट अजय जैन